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लज्जा गौरी का प्रमुख मंदिर कर्नाटक राज्य में महाकूट (Mahakuta) नामक स्थान पर स्थित है, जो बादामी और ऐहोल के प्राचीन मंदिर समूहों के निकट है। यहां पर चालुक्य काल के मंदिरों में इस देवी की प्राचीन मूर्तियाँ देखने को मिलती हैं। इसके अलावा ऐहोल और बादामी क्षेत्र में भी लज्जा गौरी की अनेक दुर्लभ प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं, जो इस उपासना की प्राचीनता और महत्व को दर्शाती हैं।
लज्जा गौरी, आदिशक्ति का ही एक गूढ़ तांत्रिक रूप हैं। इन्हें माँ पार्वती और शक्ति के उस स्वरूप के रूप में माना जाता है जो संपूर्ण सृष्टि के उत्पत्ति और पोषण का आधार है। यह रूप विशेष रूप से स्त्री शक्ति, जन्म और जीवन ऊर्जा का प्रतीक है। तंत्र साधना में इन्हें अत्यंत शक्तिशाली और सिद्धिदायिनी देवी माना जाता है।
इस स्वरूप की पूजा प्राचीन काल में विशेष रूप से संतान प्राप्ति, समृद्धि और उन्नति के लिए की जाती थी। साधक इस देवी की उपासना के माध्यम से जीवन में सृजनात्मक ऊर्जा और स्थिरता प्राप्त करता है।
श्लोक
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
लज्जा गौरी हमें यह सिखाती हैं कि सृष्टि की मूल शक्ति स्त्री ही है, जो सृजन, पालन और परिवर्तन का आधार है। यह देवी न केवल भौतिक समृद्धि अपितु आध्यात्मिक उन्नति का भी मार्ग प्रशस्त करती हैं।
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