Friday, April 10, 2026

तांत्रिक परंपरा में स्वर मातृका “औ” की अधिष्ठात्री माता अघोरा 🌷

तांत्रिक परंपरा में स्वर मातृका “औ” की अधिष्ठात्री माता अघोरा, औषधी स्वरूप में अत्यंत रहस्यमयी और प्रचंड शक्ति की प्रतीक मानी जाती हैं। सिद्धशाबर तंत्र में वर्णित ध्यान के अनुसार उनका स्वरूप साधारण नहीं, अपितु दिव्य रहस्य से भरा हुआ है।

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औकाराख्या ह्यघोरेयं कराली दीर्घ जिह्विका ।
एकवक्रा वक्रनेत्रा भृकुटी कुटिलेक्षणा ॥
नीलमेघनिभा रौद्री भेरुंडवरवाहना ।
षड्भुजा केकरैर्धत्ते शूलं खड्ग वरं तथा ॥
गदा खेटा भयान्वामे दधाना च महोदरी ॥

उनका शरीर गहन नील मेघ के समान दिखाई देता है, जो अनंत आकाश और अज्ञात तत्त्व का प्रतीक है। एक मुख, कुटिल भृकुटि और टेढ़ी दृष्टि उनके उग्र स्वरूप को प्रकट करती है। उनकी दीर्घ और विकराल जिह्वा रौद्र शक्ति का संकेत देती है, जो अज्ञान और भय का नाश करती है।

माता अघोरा भेरुंड नामक द्विमुखी पक्षी पर आरूढ़ हैं, जो अद्वितीय शक्ति, नियंत्रण और तांत्रिक सामर्थ्य का प्रतीक है। उनके छह भुजाएँ हैं, जिनमें त्रिशूल, खड्ग, गदा और खेट धारण किए हुए हैं, साथ ही वर और अभय मुद्रा में स्थित होकर वे साधक को कृपा और निर्भयता प्रदान करती हैं। उनका विशाल उदर सम्पूर्ण सृष्टि को धारण करने वाली आदिशक्ति का प्रतीक माना गया है।
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यह स्वरूप देखने में भले ही भयानक प्रतीत हो, अपितु साधक के लिए यह अत्यंत कल्याणकारी है। अघोरा वह शक्ति हैं जो भय को समाप्त कर आत्मबल प्रदान करती हैं, और साधना के मार्ग में आने वाले समस्त अवरोधों का नाश करती हैं।

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