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अग्नि, राख और मौन के बीच विराजमान, तीन मुखों से त्रिकाल को भेदती हुई — यह हैं ऊंटवाहिनी त्रिकाल भैरवी। यह केवल देवी का स्वरूप नहीं, अपितु वह चेतना है जो जन्म और मृत्यु के रहस्य को नियंत्रित करती है। जहां संसार समाप्त होता है, वहीं से इनकी सत्ता प्रारंभ होती है।
तीन मुख — भूत, वर्तमान और भविष्य का साक्षात ज्ञान।
कोई कर्म, कोई विचार, कोई रहस्य इनसे छुपा नहीं। साधक के जीवन का हर सूत्र इनके अधीन होता है।
ऊंट वाहन — तप, धैर्य और कठिन साधना का प्रतीक।
यह देवी उसी को स्वीकार करती हैं, जो जीवन के रेगिस्तान में भी अडिग रहे। यह मार्ग सरल नहीं, अपितु अग्नि परीक्षा जैसा है — जहाँ हर कदम पर साधक का साहस परखा जाता है।
हाथों में खड्ग और त्रिशूल, गले में मुंडमाला, और चारों ओर श्मशान की ज्वाला — यह संकेत है कि यह शक्ति अहंकार, भय और मृत्यु के भ्रम को भस्म कर देती है। जो इस शक्ति को समझ लेता है, वह मृत्यु से भी परे हो जाता है।
इस उग्र, श्मशानवासी शक्ति का एक गंभीर और रहस्यमयी श्लोक —
“श्मशानवासिनी काली करालवदना शुभे।
भूतप्रेतपिशाचाद्यैः सेविता सिद्धिदायिनी॥”
यह श्लोक उस शक्ति का आह्वान है जो श्मशान में निवास करती है, भूत-प्रेत और अदृश्य शक्तियों पर अधिकार रखती है, और साधक को सिद्धि प्रदान करती है।
यह कोई सामान्य उपासना नहीं — यह आत्मपरिवर्तन का मार्ग है।
जो इस मार्ग पर चलता है, वह भय से मुक्त होकर स्वयं अपने भाग्य का स्वामी बन जाता है।
नमामीशमीशान
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