जब नीलाचल धाम में भगवान जगन्नाथ का दिव्य राज्य प्रतिष्ठित हुआ, तब उस पवित्र भूमि की रक्षा हेतु एक और अदृश्य शक्ति प्रकट हुई—माता चामुंडा। यह वही उग्र देवी हैं, जो श्मशान की अधिष्ठात्री और तांत्रिक साधनाओं की परम शक्ति मानी जाती हैं।
पुरी के श्रीक्षेत्र में जहाँ एक ओर करुणा और भक्ति का प्रवाह है, वहीं उसकी सीमाओं की रक्षा हेतु माता चामुंडा दंडिनी रूप में विराजमान हैं।
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माता चामुंडा, भगवान शिव की उग्र शक्ति तथा माँ दुर्गा का भयंकरतम स्वरूप मानी जाती हैं। कालीवर्णा, अस्थिपंजर सदृश देह, गले में मुंडमाला, हाथों में त्रिशूल, खड्ग और कपाल धारण किए हुए—यह देवी मृत्यु और भय पर विजय का प्रतीक हैं। उनका वाहन श्वान या शव माना गया है, जो श्मशान तत्त्व और वैराग्य का संकेत देता है।
शास्त्रों में वर्णित है कि श्रीक्षेत्र की मर्यादा को भंग करने वाले दुष्ट, पिशाच और अदृश्य बाधाएँ माता चामुंडा के प्रकोप से नष्ट हो जाती हैं। वे केवल विनाश की देवी नहीं, अपितु धर्म की सीमा रेखा हैं—जो साधक को संरक्षण देती हैं और अधर्मी को दंड।
इसी कारण तांत्रिक परंपरा में उन्हें "श्मशान दंडिनी" कहा जाता है—जो सूक्ष्म जगत की प्रहरी बनकर धर्म की रक्षा करती हैं और साधकों को निर्भयता प्रदान करती हैं।
स्तोत्र
काशी से चली शक्ति जब पहुँची नीलाचल धाम।
चामुंडा रूप में प्रकट हुई, धारण कर विकराल नाम॥
मुंडमाला कंठ में शोभे, कर में त्रिशूल विशाल।
श्मशान वासिनी माँ बनी, दुष्टों की करती काल॥
श्वान वाहन, कपाल धरे, दृष्टि अग्नि समान।
मर्यादा की रेखा बनकर, करती धर्म विधान॥
जो कोई लांघे सीमा को, करे अधर्म का संग।
उग्र रूप धर माता देती, उसको कठोर दंड॥
पिशाच, दैत्य, बाधा सब, होते क्षण में नाश।
भय मिटे, संकट हटे, माँ से पाए त्राण विशेष॥
जय चामुंडा दंडिनी माँ, जय जगन्नाथ के धाम।
रक्षा कर भक्तों की तू, रखे धर्म का मान॥
नमामीशमीशान
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