श्मशान की निस्तब्धता में, जहाँ समय भी थम जाता है, वहाँ विराजती हैं त्रिशिरा रक्तकालिका — तीन मुखों वाली, लाल वर्ण से दीप्त, काल और अग्नि की संयुक्त अधिष्ठात्री। गिद्ध वाहन पर आरूढ़ यह देवी मृत्यु, रहस्य और तांत्रिक शक्ति की परम प्रतीक हैं। इनके प्रत्येक मुख में अलग भाव है — सृष्टि, संहार और संरक्षण का त्रिविध रहस्य।
गले में सजी मुंडमाला केवल भय का संकेत नहीं, बल्कि अहंकार, अज्ञान और कर्मबंधन के विनाश का प्रतीक है। इनके हाथों में खड्ग, त्रिशूल और अग्नि से भरा पात्र यह दर्शाते हैं कि यह देवी साधक के भीतर के अंधकार को भस्म कर उसे नई शक्ति प्रदान करती हैं। गिद्ध, जो मृत तत्वों का भक्षक है, यहाँ देवी की उस शक्ति का प्रतीक बनता है जो हर नकारात्मकता को समाप्त कर देती है।
इनका लाल वर्ण केवल क्रोध नहीं, अपितु शक्ति, चेतना और जागृत कुंडलिनी का प्रतीक है। यह देवी उन साधकों के लिए विशेष है जो तंत्र मार्ग पर चलकर भय, मृत्यु और माया के बंधनों से परे जाना चाहते हैं।
श्लोक
रक्तवर्णा त्रिशिरा घोररूपा भयंकरी।
मुंडमालाविभूषिता खड्गत्रिशूलधारिणी॥
श्मशानवासिनी देवी गिद्धवाहनसंयुता।
कालाग्निरूपिणी शक्तिः सर्वशत्रुविनाशिनी॥
या देवी सर्वभूतेषु रौद्ररूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
जो साधक सच्चे मन से इनका स्मरण करता है, उसके भीतर छिपी भय की हर परत समाप्त होने लगती है और वह अदृश्य शक्तियों का अनुभव करने लगता है।

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