संध्या का समय था। आकाश स्वर्णिम हो रहा था, और उसी क्षण एक अद्भुत शांति पूरे वातावरण में फैल गई। उस दिव्य क्षण में भगवान विष्णु शेषनाग की अनंत फणों के नीचे विराजमान थे, और उनकी गोद में एक बालक गहरी निद्रा में लीन था। वह कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि वही अटूट भक्ति का प्रतीक प्रल्हाद था, जिसने अधर्म के सामने कभी झुकना स्वीकार नहीं किया।
कथा आरंभ होती है असुरराज हिरण्यकशिपु से, जिसने तपस्या करके यह वरदान पाया कि उसे कोई भी न मार सके। अहंकार में डूबकर उसने स्वयं को ही ईश्वर घोषित कर दिया और पूरे राज्य में आदेश दिया कि केवल उसकी ही पूजा हो। परंतु उसके अपने ही पुत्र प्रल्हाद ने बचपन से ही भगवान विष्णु को अपना आराध्य मान लिया।
जब प्रल्हाद ने पिता के आदेश को अस्वीकार कर “नारायण” का स्मरण करना जारी रखा, तब हिरण्यकशिपु क्रोधित हो उठा। उसने अपने ही पुत्र को अनेक प्रकार की यातनाएँ दीं। कभी उसे विष दिया गया, कभी ऊँचे पर्वत से गिराया गया, कभी हाथियों से कुचलवाने का प्रयास हुआ, और अंत में होलिका की अग्नि में बैठाया गया। परंतु हर बार प्रल्हाद की रक्षा स्वयं भगवान ने की।
एक दिन क्रोध से भरे हिरण्यकशिपु ने पूछा, “कहाँ है तेरा विष्णु?” प्रल्हाद ने शांत स्वर में उत्तर दिया, “वे सर्वत्र हैं।” यह सुनकर हिरण्यकशिपु ने महल के एक स्तंभ की ओर संकेत किया और पूछा, “क्या इस स्तंभ में भी?” प्रल्हाद ने कहा, “हाँ, यहाँ भी।” उसी क्षण स्तंभ से एक प्रचंड ध्वनि हुई, और भगवान नरसिंह प्रकट हुए। न आधा मनुष्य, न पूरा पशु, उस अद्भुत रूप में उन्होंने हिरण्यकशिपु का अंत कर दिया और धर्म की स्थापना की।
उसके बाद जब क्रोध शांत हुआ, तब वही भगवान अपने कोमल विष्णु स्वरूप में प्रकट हुए। उन्होंने प्रल्हाद को अपनी गोद में उठा लिया, जैसे इस चित्र में दिखाया गया है। शेषनाग की छाया में, प्रभु ने अपने प्रिय भक्त को स्नेह और सुरक्षा का अनुभव कराया। यह क्षण केवल विजय का नहीं, बल्कि भक्ति और भगवान के बीच के प्रेम का प्रतीक है।
श्लोक
उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्।
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्॥
इस श्लोक में उसी नृसिंह भगवान का स्मरण है, जिन्होंने प्रल्हाद की रक्षा के लिए प्रकट होकर अधर्म का अंत किया।
यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति में अद्भुत शक्ति होती है। जब मन पूर्ण विश्वास से ईश्वर का नाम लेता है, तब कोई भी संकट बड़ा नहीं होता। प्रल्हाद की तरह जो भक्त अडिग रहता है, उसे अंततः भगवान स्वयं अपनी गोद में स्थान देते हैं और हर भय से मुक्त कर देते हैं।
नमामीशमीशान
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