जब काम नहीं रहेगा, तब न प्रेम रहेगा, न परिवार की स्थापना होगी, न संतान उत्पत्ति होगी। मनुष्य का मन निरस और निष्प्राण हो जाएगा। कला, संगीत, काव्य—सबका अस्तित्व मिटने लगेगा, क्योंकि इन सबकी जड़ में भी भाव और आकर्षण ही छिपा होता है।
शास्त्रों में काम को केवल वासना नहीं, बल्कि दिव्य शक्ति माना गया है। स्वयं देवताओं ने भी कामदेव की आवश्यकता को स्वीकार किया है, क्योंकि बिना इच्छा के कोई भी कर्म संभव नहीं है।
श्लोक:
कामो वै प्रथमं सृष्टिः
काम एव जगत् कारणम्।
कामे बिना न सृज्येत
किंचिदपि चराचरम्॥
अर्थात काम ही सृष्टि की प्रथम प्रेरणा है, वही इस जगत का कारण है। काम के बिना इस चराचर जगत में कुछ भी उत्पन्न नहीं हो सकता।
इसलिए काम का नाश नहीं, अपितु उसका संतुलन आवश्यक है। जब काम मर्यादा में रहता है, तब वह प्रेम बनता है, भक्ति बनता है, और जीवन को सुंदर बनाता है। परंतु जब वह अनियंत्रित होता है, तब वही विनाश का कारण भी बन जाता है।
अतः काम का अभाव नहीं, अपितु उसका शुद्ध और संतुलित रूप ही जीवन का सच्चा सौंदर्य है।
नमामीशमीशान
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