वह्निवासिनी षोडश नित्याओं में पाँचवाँ स्वरूप हैं और ये भी त्रिपुरसुंदरी की दिव्य अग्नि शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं।
जैसा कि नाम से स्पष्ट है—ये देवी अग्नि (वह्नि) में निवास करने वाली शक्ति हैं।
वह्नि = अग्नि
वासिनी = निवास करने वाली
वह्निवासिनी देवी का स्वरूप तेजस्वी और दिव्य होता है—
स्वर्णिम या अग्नि के समान लाल-पीला वर्ण
चार भुजाएं
पाश, अंकुश, धनुष और बाण धारण करती हैं
अग्नि-ज्योति से घिरी हुई
कमलासन या अग्नि मंडल में विराजमान
इनका स्वरूप दर्शाता है कि वे शुद्धि, ऊर्जा और तेज की अधिष्ठात्री हैं।
श्रीविद्या साधना में वह्निवासिनी का अत्यंत विशेष स्थान है।
ये देवी—
नकारात्मक ऊर्जा को जलाकर समाप्त करती हैं
साधक के भीतर तेज (ओज) बढ़ाती हैं
आत्मशुद्धि और तपस्या की शक्ति देती हैं
वह्निवासिनी का प्रमुख मंत्र है—
॥ ह्रीं वह्निवासिन्यै नमः ॥
यह मंत्र विशेष रूप से शुद्धि, तेज और ऊर्जा जागरण के लिए प्रभावी माना जाता है।
वह्निवासिनीं तेजोरूपां त्रिनेत्रां
स्वर्णप्रभां दिव्यविभूषणाढ्याम् ।
पाशाङ्कुशं धनुरिशून् वहन्तीं
ध्यायामि देवीं हृदि भावयामि ॥१॥
ह्रींकाररूपां ज्वलनस्वरूपां
दुष्टप्रशान्तिं करुणामयीं ताम् ।
भक्तार्तिनाशां वरदां शुभां तां
वह्निवासिनीं शरणं प्रपद्ये ॥२॥
ज्वालामालां दहन्तीं पापराशिं
तेजःप्रदां भास्करकोटिसङ्काशाम् ।
तप्तस्वरूपां तपसां प्रदात्रीं
वह्निवासिनीं प्रणतोऽस्मि नित्यम् ॥३॥
अज्ञानतिमिरं हर मे दयालु
चित्तं शुद्धं कुरु मे सदाऽम्बे ।
आत्मप्रकाशं प्रददासि नित्यं
वह्निवासिनि त्वयि भक्तिरस्तु ॥४॥
॥ इति श्री वह्निवासिनी स्तोत्रम् ॥
वह्निवासिनी की उपासना से—
मन और शरीर की शुद्धि होती है
तेज, ओज और आभा बढ़ती है
नकारात्मकता नष्ट होती है
साधक में तप और आत्मबल जागृत होता है
वह्निवासिनी केवल बाहरी अग्नि नहीं,
अपितु अंतर की तपशक्ति (आत्मिक अग्नि) हैं।
जो स्वयं को तप में डालता है,
वही शुद्ध होकर दिव्य बनता है।

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